Thursday, March 18, 2010

बूँद बूँद का सपना..

गर्मियों के आते ही दूबे जी का एकसूत्री कार्यक्रम है.अपने सो काल्ड बगिया के गिने चुने चार पौधों को पानी देते हुए पूरे घर के फर्शों को पानी से धुलना.भरसक कोशिश करता हूँ कि मैं उनके 'वैचारिक सुनामी' का शिकार ना बनू पर आमना सामना to हो ही जाता है,भई,पडोसी जो हैं.अटैक इस दी बेस्ट डीफेंस,सो मै उनके फर्श धुलाई कार्यक्रम को आड़े हाथ लेते हुए कहने लगा कि जब दुनिया २२ मार्च को विश्व जल दिवस मनाने के प्रति गंभीर है तो आप काहे यूं पानी की फिजूल खर्ची में तत्पर हैं. दूबे जी ऐसे बिफरे मानो उन्हें मैंने लाल कपडा दिखा दिया हो.कहने लगे कि जब जूबी डूबी गाने में करीना आरटीफीसीयल बारिश में भीगते दिखती हैं तब तो हम युवा चटखारे लेकर देखते हैं और पानी के फिजूलखर्ची के बारे में नहीं सोचते.मैंने उन्हें समझाया कि फ़िल्मी कल्पना बारिश और पानी के बिना अधूरी है.कहने लगे कि तेल लेने गयी ऐसी कल्पना.पूरी उम्र बीत गयी फिल्मों में यह देखते देखते कि बरसाती रातों में अक्सर भीगी भागी हेरोइने आसरा लेने नायक का दरवाजा खटखटाती हैं.न जाने कितने सावन भादो बीत गए.पर घर के चौखट पर सीवर चोकिंग के फलस्वरूप इकठ्ठा कचरे के अलावा किसी और ने दस्तक नहीं दी.

बात को घुमाते हुए मैंने उन्हें बताया कि इस साल २०१० वर्ल्ड वाटर डे पर एक विश्व्यापी एवायरनेस कार्यक्रम के तहत हजारो वालेंटीयरस,टॉयलेट के लिए एक सांकेतिक क्यू का निर्माण करके लोगों का ध्यान आकर्षित करेंगे.सुलगे हुए दूबे जी के अनुसार इस तरह के टॉयलेट क्यू का बनना तो हमारे देश में हर सुबह का आम नज़ारा है.इससे कौन सा पानी के प्रति एवायरनेस पैदा हो जायेगा.दुनिया की नज़र पांड़े जी के अहाते में लगे दर्ज़नो यूकीलिप्टस पेड़ों पर नहीं जाते जो प्रतिदिन अपने से दुगने व्यक्तियों का पानी धरती से सोखते रहते हैं.बात तो उनकी सही थी पर सार्वजिक परिचर्चा में निजी खुन्नसों को दूर रखना दूबे जी को कौन सम्झाए.मैंने उन्हें समझाया की संसार में अनेको ऐसे स्थान हैं जहाँ टॉयलेट जैसे मूलभूत सुबिधाओं का भी टोटा है.ऐसे में यह क्यू इवेंट मूलभूत जरूरतों के लिए आम इंसान के पहुँच का प्रतीक है.यह उन 2.5 billion लोगों के लिए आवाज उठाने की कोशिश है जिनकी साफ़ पेयजल तक पहुँच ही संभव नहीं है.

वैसे भी हम उस देश के वासी हैं जहाँ एक ओर तो गंगा के पानी को अमृत का दर्ज़ा दिया जाता है वहीँ दूसरी ओर कुम्भ जैसे आयोजनों में फूल,गजरे,अगरबत्ती,आदि से गंगा को प्रदूषित करने के अलावा लोग सुबह सुबह चुपके से तट पर ही दैनिक क्रियाओं से भी बाज नहीं आते.हम इसलिए भी ख़ास हैं क्योंकि हम बाथ टब में नहाते,खुले टैप पर ब्रुश करते,गाड़ियों को धोते रोजाना लाखों लीटर पानी वेस्ट करते हैं और जरूरत पड़ने पर पानी की बोतल खरीदने से लेकर हजारों रुपए के वाटर सैनीटेशन भी करते हैं.एक आंकड़े के अनुसार,पानी जनित रोगों से विश्व में हर वर्ष २२ लाख लोगों की मौत हो जाती है। शायद इसी वजह से इस साल वर्ल्ड वाटर डे की थीम है-clean water for a healthy world. जहाँ तक भारत की बात है,करीब 15 लाख बच्चों की प्रतिवर्ष तो सिर्फ डायरिया के कारण मृत्यु हो जाती है।वैसे,एक आंकड़ा यह भी है कि भारत जल की गुणवत्ता के मामले में 122 देशों में से 120वें स्थान पर आता है।

प्यासे को पानी पिलाकर पुण्य कमाने वाले देश में आज पानी के लिए हत्याएं हो रही हैं.याद आता है वो बचपन जब स्कूल जाते समय आज की तरह वाटर बोतल ले जाने की कभी जरूरत नहीं पड़ी.स्कूल के पीछे कुएं पर लगा हैंडपंप हम सबकी प्यास बुझाने के लिए काफी था.वो अनगिनत तालाब अब सुख चुके हैं जिनका किनारा कभी हमारा प्ले ग्राउंड हुआ करता था.हैंडपंप के पानी से भरे मिटटी के मटके ने कब रूप बदल कर कैंडल वाले फिल्टर में बदल गया पता ही नहीं चला.शायद अब वो समय आ गया है कि जब हम पानी कि कीमत को समझें वरना वो दिन दूर नहीं जब नहाना,धोना,सुखाना,भीगना,भिगाना,जैसे शब्द सिर्फ डिक्शनरी में ही रह जायें और अफ़सोस में निकला आखों के पानी की भी कीमत लगने लगे.
(22 मार्च को i-next में प्रकाशित)link-http://www.inext.co.in/epaper/inextDefault.aspx?edate=3/22/2010&editioncode=1&pageno=12

Wednesday, March 3, 2010

तस्वीर के उस पार

दूबे जी आजकल घर से ज्यादा बेवफा बार पर दिखाई देते हैं. जी नहीं, यह किसी शराब के ठेके का नाम नहीं है. यह उनके द्वारा बनायी गयी एक सोशल नेटवर्किंग कम्युनिटी है, जिस पर आजकल वो ताबड़तोड़ प्रेम विरोधी ब्लॉग्स पोस्ट कर रहे हैं. करें भी क्यों ना, इसी वैलेंटाइन्स डे पर उनका दिल जो टूटा है. टूटे दिल की भड़ास निकलने के लिए दूबे जी ने यह तरीका क्यों अपनाया, यह पूछते ही उन्होंने मुझे तुरंत डस लिया. कहने लगे कि आजकल यूएसबी प्लगइन की तरह आसान हो चुके रिश्तों और संबंधों की जोड़-तोड़ से अच्छा तो उनके स्टफी का प्यार है, जो बिना किसी शर्त के है. वो चाहे उसे कितना भी डांट-डपट लें पर उसकी ईमानदारी और निश्छल प्रेम एक यूनिवर्सल कॉन्सटेंट की तरह बना रहता है.
स्टफी उनके द्वारा पाला गया नया नया डॉगी है. मोहब्बत में दिल टूटा तो कुत्ता पाल लिया, इस फलसफे के पीछे अब दूबे जी की जो भी मंशा हो पर छेड़ने के लिए मैंने उनसे पूछ ही लिया कि उनके अनुसार आखिर प्यार है क्या? कहने लगे कि प्यार वो है जो क्लास रूम, ऑफिस आदि से शुरू होकर पार्को, कैफेटेरिया के आसपास, मल्टीप्लेक्सेस से गुजरते हुए खत्म किसी दोस्त के खाली पड़े फ्लैट पर होता है. एक जमाना था कि जब प्यार कॉलेज लाइब्रेरी के खामोश माहौल में भी पनपता था. पर प्यार ने कब लाइब्रेरी के सार्वजनिक माहौल से निकलकर साइबर कैफे के तंग दायरे को अपना लिया, पता ही नहीं चला. मैंने विरोध किया कि वो सिर्फ अपने निजी अनुभव पर लव आजकल को नहीं तौल सकते पर ऐसा बोलते ही उन्होंने तुरंत किसी अखबार में प्रकाशित एक सर्वे का आंकड़ा मेरे ऊपर उगल दिया.
इसके अनुसार वैलेंटाइन-डे के मौके पर अब चॉकलेट्स, फूलों, सॉफ्ट टॉय से कहीं ज्यादा कंडोम्स और वियाग्रा की बिक्री बढ़ जाती है. दिलजले दूबे जी से और बहस करना बेकार था. पर मैं भी सोचने लगा कि क्या वाकई लव आजकल बदल गया है? लव जैसे भारी-भरकम विषय पर कोई बात कहने के लिए फिलहाल मेरी उम्र और तजुर्बा दोनों ही कम हैं, पर एक बात तो पक्की है कि समाज में हर ट्रेंड और रिश्तों का स्वरूप बदल रहा है और लव भी उससे अछूता नहीं है. भले ही आज प्यार में भावनाएं पत्थरों में लिपटकर डेस्टिनेशन ए मोहब्बत तक पहुंचने के बजाय एसएमएस, ईमेल्स के जरिये जा रहा हो पर प्यार जैसा भी है, उसे उसी स्वरूप में हमें स्वीकार करना होगा.
वैसे हमारे यहां रीति को कुरीति बनाने की परंपरा बहुत पुरानी है. समाज की जड़ों में गहराई तक बस चुका डाउरी सिस्टम इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण है. गार्जियन का एक्सप्रेशन ऑफ केयर कब कंप्लशन बन गया पता ही नहीं चला. शादियों में खुशी में छुड़ाये जाने वाले पटाखों ने भी अपना स्वरूप बदलकर असलहों से फायरिंग का रूप ले लिया. प्रतिवर्ष कितने ही इस फिजूल के पॉम्प एंड शो में अपनी जान गंवा देते हैं. वैसे बदलाव हमेशा नकारात्मक ही नहीं होते. क्रिकेट का भी स्वरूप बदला तो रोमांच और मनोरंजन से भरपूर ट्वेंटी-ट्वेंटी क्रिकेट का उदय हुआ. पर इसके इतना पॉपुलर होने के बाद भी हम नहीं भूले कि क्रिकेट का असली स्वरूप टेस्ट क्रिकेट ही है. दसवीं और बारहवीं बोर्ड एग्जाम में अब ग्रेडिंग सिस्टम लाने की तैयारी है. शिक्षा का भी स्वरूप बदला है पर हम नहीं भूले हैं कि शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञान है. किसी के लिए बोझ बनना नहीं.
इसी कड़ी में हमने होली को भी नहीं छोड़ा। अभी-अभी होली बीती है। प्रशासन का साफ आदेश था कि जो होली नहीं खेलना चाहते, उन्हें जबरदस्ती रंग ना लगाया जाए. फिर भी हम नहीं माने. फागुन की मस्ती में रंगों के अलावा कीचड़, पेंट, वार्निश, पोटाश और न जाने कौन-कौन से सबस्टीट्यूट का प्रयोग जमकर हुआ. बुरा न मानो होली है की टैगलाइन प्रयोग जमकर हुआ. विरोधियों के कपड़े होली के नाम पर फटकर शहीद हो गए. सड़कों पर शराबियों की धींगामुश्ती आम ऩजारे की तरह दिखाई दी. अब होली की दिन शराब की बढ़ती एक्सेप्टेंस देखकर तो यही लगता है कि शायद एक दिन होली को सरकार मद्यपान दिवस न घोषित कर दे. कभी-कभी ऐसा होता है कि बड़े-बड़े मुद्दों पर बात करते-करते छोटे मसले अक्सर नजरअंदाज कर दिए जाते हैं. उम्मीद है, अब हम इस तरह के नजरअंदाजी से बचने की एक कोशिश तो जरूर करेंगे. यानी तस्वीर में जो रंग हैं, उन्हें उनकी ओरिजनैलिटी के साथ एक्सेप्ट करने में ही भलाई है.

Thursday, January 28, 2010

READY FOR THE CHANGE?

सलमान खान और दूबे जी में क्या समानता है?जी नहीं,दोनों के फीजिक में ज़मीन आसमान का अंतर है.समानता यह है कि दोनों ही शाहरुख़ खान की चर्चा करना भी पसंद नहीं करते.वो हर बात पर शाहरुख़ का विरोध क्यों करते हैं,यह तो नहीं पता पर दूबे जी अक्सर बताते हैं कि फौजी सीरीयल पहले उन्हें ही ऑफर हुई थी पर किंग खान ने उनका पत्ता काट दिया.यह झूठ हो या सच पर उन्हें आजकल शारुख खान के विरोध में नया मसाला मिल गया है.'मिले सुर मेरा तुम्हारा' के नए वर्सन में उन्हें शाहरुख़ के दिखने पर भी आपत्ति है.उनको लगता है कि यहाँ भी वो उनके देवतुल्य अमिताभ बच्चन की बराबरी कर रहे हैं.तभी गाने की शुरुआत अमिताभ से होती है और खत्म शहरुख से।

दूबे जी को शाहरुख़ का अमिताभ से बराबरी करना बिलकुल अच्छा नहीं लगता.कहने लगे कि बड़े बुजुर्ग से क्या मुकाबला करना.बच्चनवा के उम्र में देख्नेगे कि शाहरुख़ कितना रोल पायेंगे.गलती दूबे जी कि नहीं,मीडिया ने भी शाहरुख़ बच्चन शीतयुद्ध को ऐसे परोसा है कि हर किसी को इन दोनों के बीच न दिखने वाली यह खाई कभी पटते नहीं दिखाई देती.,दूबे जी को तो नया 'मिले सुर मेरा तुम्हारा' भी नहीं पसंद.उन्हें पुराना वाला ही अच्छा लगता है.वो कुछ मोहब्बतें फिल्म के नारायण शंकर वाले चरित्र की तरह हैं जिसे परिवर्तन बिलकुल पसंद नहीं।
अब इस गाने का चाहे जो भी संस्करण अच्छा हो,पर परिवर्तन और नए चीजों के विरोध की मानसिकता सिर्फ दूबे जी की नहीं,कमोवेश समाज के एक बड़े भाग की है.चलिए इसका एक निजी एक्साम्पल देता हूँ.भारत में जब मोबाइल सेवाएँ शुरू हुईं तो मैं भी उसके प्रारंभिक कन्जुमर्स में से एक था.हालांकि सेवाएँ बहुत महंगी थी सो जाहिर है कि यह सुविधा डैड्स गिफ्ट ही थी पर कुछ लोगों हेतु मेरा छात्र जीवन में मोबाइल फ़ोन प्रयोग करना मेरे नालायकी का प्रतीक बन गया.आज देखिये.हालात् कितन बदल गए हैं.रोटी,कपडा मकान के साथ मोबाइल भी एक दैनिक जरूरत बन गयी है. इसके बिना तो सामाजिक जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।
हाल ही में एक अत्यंत प्रसिद्ध महिला आधारित मैगजीन गृहलक्ष्मी ने स्पेशल लान्जरी गाईड लांच की है.घरेलु महिलाओं में अत्यंत प्रचलित इस मैगजीन का यह नया तेवर अचानक से कुछ लोगों के आँखों में चुभ सकता है.पर इस तरह का बदलाव इस बात का घोतक है कि हम अब परिवर्तनों को स्वीकार करने में सक्षम हैं.अब हम उन बातों पर खुलकर बात कर सकते हैं जो कभी सिर्फ एक महिला घर की बड़ी महिलाओं से ही करना पसंद करतीं थीं.इसका एक और उदहारण कई प्रसिद्ध रास्ट्रीय पत्रिकाओं द्वारा कराये जा रहे सेक्स सर्वें हैं.सेक्स को लेकर जो हमारी रुढिवादिता है,वो किसी से छुपी नहीं पर इन सर्वेस में लोगों की बढती भागेदारी यह बताती हैं कि बंदिशें टूट रहीं हैं।विज्ञापनों की भी भाषा बदल गयी है.'उन दिनों की बात' बदलकर अब 'हैव अ हैप्पी पीरीयड ' हो गयी है.याद है जब दुलारा फिल्म का 'मेरी पैंट भी सेक्सी' गीत में 'सेक्सी' सेंसर के दवाब में 'फैनसी' हो गया था.आजकल अखबारों के हेड लाइन्स से लेकर सामान्य बोलचाल तक में यह शब्द स्वीकार्य हो चुका है.

वैसे हम पूरी तरह से भी नहीं बदले हैं.यह वही देश है जहाँ रोमांटिक फिल्मों को सपरिवार देखने वाले लोगों द्वारा प्रेम संबंधों में पड़े जोड़ों को मौत के घाट उतर दिया जाता है.जल्द ही वैलेंटाइन डे भी आने वाला है.संस्कृति और सभ्यता के नाम पर फिर राजनीति होगी.प्रेमी जोड़े सरेआम बे इज्ज़त किये जायेंगे.मौके पर घिर गयी लड़कियों से छेड़ छाड़ होगी.मीडिया के कैमरों में यह सब कैद होकर हमें भी दिखेगा.पुलिस फिर सख्ती दिखाएगी, पर यह चीजें रुकेंगी नहीं. मोहब्बतें में तो नारायण शंकर ने भी आखिर में बदलाव को स्वीकार कर लिया था पर समाज में फैले इन अनगिनत नारायण शंकरो को बदलने के लिए भी एक राज आर्यन मल्होत्रा की जरूरत है,क्या आपको नहीं लगता?
3 फरवरी को i-next में प्रकाशित...http://inext.co.in/epaper/Default.aspx?edate=2/3/2010&editioncode=1&pageno=16

Wednesday, January 20, 2010

यह मर्ज़ कुछ खास है..

फिल्में समाज का दर्पण है,आजकल दूबे जी इस बात को नहीं मानते .कुछ हफ़्तों पहले उन्होंने अमिताभ बच्चन की 'पा' देखी है.बताने लगे कि फिल्म तो ठीक है पर उसे देखने के बाद से उनके दिल में आजकल के डाईरेकटरों के प्रति खासी नाराज़गी पैदा हो गयी है.'नाराज होकर भी क्या बिगाड़ लोगे' की भावना दिल में रखकर जब मैंने इसके बारे में पूछा तो बताने लगे कि यह आजकल के डाईरेक्टर ऐसी ऐसी बीमारियों पर फिल्में बनाते हैं जो कभी सुनी ही नहीं.उनका इशारा जल्द आ रही 'माई नाम इस खान' में शाहरुख़ की बीमारी के तरफ था.कहने लगे कि इससे अच्छा तो उनका दौर था जब हीरो कैनसर,दमा,ब्रेन टूमर से आगे की बीमारियों से ग्रसित होने के बारे में सोच भी नहीं पाता था.मैंने समझाया कि हर युग में अलग प्रकार की बीमारियों का फॉर्मेट होता हैं .इन आउटडेटेड बीमारियों से तो आजकल हर कोई ग्रसित है.इन्हें देखने कौन हॉल में जाने वाला है?


बहस छिड़ चुकी थी.दूबे जी कहने लगे कि जब आजकल रेअलिस्टिक फिल्में ज्यादा बन रहीं हैं तो बीमारियाँ भी रेअलिस्टिक होनी चाहिए.मधुमेह,बवासीर,रतौंधी,मोतियाबिंद,दाद-खाज,जैसी आम जनता की बीमारियों से जुडी समस्याओं को,फिल्मों के द्वारा क्यों नहीं सामने लाया जाता?उनके द्वारा गिनाये गए इन बीमारियों की लिस्ट में से अधिकतर से वो ग्रसित हैं सो मैंने बहस करके उनके घावों पर नमक छिड़कना सही नहीं समझा.बात आई गयी हो गयी पर इस बहस ने एक नए सवाल को जन्म दिया.क्या वाकई बॉलीवुड उन बीमारियों को ज्यादा तरजीह देता है जो बहुत कम या रेयर हैं.गजनी के आमिर खान को anterograde amnesia नामक बीमारी है,तो पा में अमिताभ बच्चन प्रोज़ेरिया नामक बीमारी से पीड़ित हैं.माई नाम इस खान में शाहरुख़ खान को Asperger syndrome(autism)परेशान कर रहा है,तो 'ब्लैक' में भी अमिताभ बच्हन Alzheimer's disease ढो रहे होते हैं.सारी बीमारियाँ लाखों में एक को होती है.
वैसे इन ख़ास बीमारियों और बॉलीवुड का पुराना नाता है.'आनंद' के राजेश खन्ना को कौन भुला सकता है जिसको 'लिम्फोसार्कोमा आफ इन्टेस्ताईन' था.आज भी हृषिकेश मुखर्जी की यह अप्रतिम कृति हमारे आँखों में आंसू ला देता है.वैसे काका ने 1969 में एक मूवी 'ख़ामोशी' भी की थी जिसमे वो acute mania से ग्रसित थे.अमिताभ बच्चन की हालिया 'पा'को छोड़ भी दें तो उन्होंने अनेक ख़ास बीमारी ग्रस्त किरदार निभाए हैं.१९७४ में उन्होंने 'मजबूर' की थी जिसमे वो terminal brain tumor से पीड़ित थे.ब्लैक का उनका किरदार तो भूला ही नहीं जा सकता.अजय देवगन ने भी 'दीवानगी' में split personality नामक चिड़िया के बारे में बताया.हाल फिलहाल के फिल्मों की बात करें तो २००७ में रीलीज़ 'तारे ज़मीन पर' एक ऐसे बच्चे की भावनात्मक कहानी थी जिसे dyslexia नामक बीमारी थी.इसी साल आई 'भूल-भुलैया' में विद्या बालन dissosiative identity disorder से पीड़ित थीं.२००५ में आई 'मैंने गाँधी को नहीं मारा' में अनुपम खेर dementia नामक बीमारी से ग्रसित थे.

२०१० में रीलीज़ होने वाली गुजारिश में रितिक रोशन Paraplegia से ग्रस्त व्यक्ति का किरदार निभा रहे हैं.कुल मिलाके सवाल यह है की इन ख़ास बीमारियों की बोलीवुड को जरूरत क्यों है?पहली बात तो यह है कि साधारण भारतीय आम मुद्दों और बीमारियों को तो अपने ज़िन्दगी में रोज देखता है पर उसे तो तीन घंटों में सिल्वर स्क्रीन पर कल्पना की उड़ान भरनी है.इसी फैनटेसी को शांत करती हैं यह ख़ास बीमारियाँ.बोलीवुड की भाषा में समझें तो शाहरुख़ खान सर्दी,खांसी मलेरिया जैसी बीमारियों से जुड़ना न चाहकर,लवेरिया जैसी टेकनीकल बीमारी से पीड़ित कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं. हाँ,एक बात और,यह बीमारियाँ अपने अस्तित्व में होने का प्रमाण भी हमारी फिल्मों के द्वारा ही देती हैं.वर्ना हम लोग़ तो अनेको बीमारियों को मात्र 'बड़े लोगों का फितूर' कहकर टाल देते हैं.इसका एक उदहारण है,तारे ज़मीन पर फिल्म में दर्शील को हुआ dyslexia,जो पढने लिखने में आने वाली एक मनोवैज्ञानिक समस्या है.पूरी अमेरिका की 5-17% आबादी इससे पीड़ित है.आम जनता तो इसे जानती ही नहीं.और अगर किसी बच्चे को दिक्कत होती भी है तो अधिकांशतः लोग़ इसे उसके पढने लिखने में दिल न लगने और नालायकी के प्रथम चरण के रूप में देखने लगते हैं।
लिंक-http://inext.co.in/epaper/Default.aspx?edate=1/19/2010&editioncode=1&pageno=16

Tuesday, January 5, 2010

उड़ियो,ना डरियो,कर मनमानी

भारत पाकिस्तान में एक बार सुलह हो सकती है पर दूबे जी और तिवारी जी का आपसी कलह कभी खत्म नही हो सकता.पर इनके बीच होने वाला कोई भी विवाद,घिसी पिटी देख लेने की धमकी और बोल बचन में ही निपट जाता है.वैसे भी,हिंसा किसी विवाद का हल नही.पर रोजाना की खिटखिट सुनने के नाते मैं अक्सर सोचता हूँ कि एक दिन दोनों आर पार का फैसला ही कर लें.लेकिन सिर्फ मेरे सोचने से क्या होता है?दूबे जी का आरोप है कि तिवारी जी,अपने गुर्गों से कहकर रोजाना उनके मेनगेट के सामने कूड़े का अम्बार लगवा देते हैं.तिवारी जी का भी यही मानना है कि उनके घर के चाहरदीवारी के अन्दर अक्सर मिलने वाले सब्जियों के छिलकों और प्लास्टिक रैपर्स के पीछे दूबे जी का ही हाथ है.ताज़ा प्रकरण में किसी ने छुट्टियों में गाँव गए दूबे जी के चाहरदिवारियों पर 'यहाँ पेशाब करना मना है' लिख दिया.लौट के आने तक उनके घर की दीवारों की हालत कुछ यूं थी कि उन्हें कुछ दिनों के लिए किराए के मकान में शिफ्ट होना पड़ा.

अब इसमें तिवारी जी का हाथ हो या ना हो,पर सवाल यह है कि कि हम वो काम ज्यादा क्यों करते हैं जो हमें मना किया जाता है?मसलन जहाँ वाहन खड़ा करने या पोस्टर चिपकाने की मनाही होती है,वहां ही इन नियमों की ज्यादा धज्जियाँ उड़ाइ जाती हैं. सरकार चीखती रह गयी कि बिना आइ एम आइ के मोबाइल इस्तेमाल करना सही नहीं पर जब तक उनपर पाबंदी न लगी,हम नही माने.शराब पीकर गाडी चलाना मना है,सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान मना है,atm में एक से ज्यादा लोगों का प्रवेश मना है.सड़कों और दीवारों पर पान मसाला खा कर थूकना मना है,ट्रेन के स्लीपर क्लास में जनरल का टिकट लेकर चलना मना है,ऑटो में ज्यादा सवारी भरना मना है,पाइरेटेड सीडी और डीवीडी का प्रयोग मना है,शादी में असलहों से फाइरिंग मना है,१८ साल से कम उम्र के लोगों का वयस्क फिल्मों हेतु सिनेमा हाल में प्रवेश मना है.मना तो बहुत कुछ है साहब,पर मानता कौन है?


हाल में ही अमेरिका यात्रा से लौटे मेरे गुरु जी का मानना है कि वहां लोगों को 'जुगाड़' यन्त्र के बारे में नही पता.शायद तभी वो नियमों के पालन के प्रति ज्यादा सजग हैं. वैसे भी हम भारतीय जुगाड़ के प्रति ज्यादा आशान्वित रहते है,शायद यही भावना हमें नियमों को ना मानने के लिए प्रेरित करती है.ट्रेफिक पुलिस के हत्थे चढ़े,तो बड़े साहब लोगों का जुगाड़.पासपोर्ट ,ड्राइविंग लाइसन्स नही बन रहा तो दलालों का जुगाड़.कहीं एडमीशन नही मिल रहा तो फर्जीवाड़े का जुगाड़.यानि जुगाड़ सर्वोपरि है.जुगाड़ पर हम कितने आधारित हैं,इसका एक्जाम्पल सुनिए.मेरे एक मित्र ने जब मुझे छोटे शहर छोड़ बड़ी जगहों पर करीयर हेतु प्रयासरत होने के लिए सुझाव दिया तो मैंने प्रयास करने से पूर्व ही जुगाड़ के बारे में पूछ लिया.मेरे एक अन्य मित्र कुछ दिनों के लिए गुजरात गए थे.चूंकि गुजरात में शराब पीना मना है,इसलिए उन्होंने मात्र कुछ ही किमी दूर केद्र शाषित प्रदेश दमन और दीव में जाकर जुगाड़ बना ही लिया.दिल्ली नॉएडा सीमा में रहने वाले बहुतेरे शराब प्रेमी कीमतों के फर्क को मिटाने के लिए रोजाना सीमा लांघते हैं.

एक सर्वे के अनुसार सिगरेट के पैकेटों पर छपी मौत की चेतावनी वास्तव में धूम्रपान करने वाले लोगों को इसके लिए और प्रेरित करती हैं।यानि स्प्रिंग को जितना दबाया जाएगा,उतना ही तेज रेएक्शन होगा.हाल में ही,उच्चतम न्यायालय ने भी केन्द्र सरकार के वेश्यावृत्ति के प्रति रुख पर टिप्पणी करते हुए पूछा था कि अगर सरकार इस पेशे पर पाबंदी नहीं लगा सकती तो इसे कानूनी मान्यता क्यों नहीं दे देती?कुल मिला के,हम मना की हुई चीजों को करने में ज्यादा फक्र महसूस करते हैं.शायद तभी राम गोपाल वर्मा की फिल्मों 'डरना मना है'और 'डरना जरूरी है' में डरना 'मना' है ज्यादा सफल हुई.यानि सिर्फ मना करना समस्या का हल नही.'बिन भये होए न प्रीति' में विश्वास करने वाला हमारा समाज कब खुद से अपने बारे में सोचना शुरू करेगा,यह देखना तो दिलचस्प होगा.फिलहाल तब तक मनमानी के इस दौर का आनंद लेने में ही भलाई है.

Thursday, December 10, 2009

MOUNTAIN CALLING

'हाईवे-यात्रा' का भी एक अलग दर्शन है.सफ़र के दौरान हाईवे पर दिखने वाली हर चीज एक कहानी बयान करती है.मीलों मील का सुनसान रास्ता,जिसमे सड़क के किनारे गाडी लगा कहीं भी खड़े होकर दैनिक क्रियाओं से निपटते लोग़.जिनकी आत्मविश्वास से घूरती निगाहें मानो यही कहती हैं कि इस सुनसान में उन्हें,कौन पहचानने वाला है?वो खाने पीने के अनगिनत ढाबे,जहाँ पकवानों से ज्यादा,खाली डोंगे और तसले दुकान के गेट की शोभा बढ़ाते हैं और कभी कभी ही फंसने वाले ग्राहकों को आकर्षित करते हैं.गाहे बगाहे मिलने वाले,भयंकर ठंडी,महाठंडी बीयर की दुकानें मानो हाईवे जर्नी बिना उनके सेवन के संभव ही न हो.देश में नपुंसकता और मरदाना कमजोरी कितनी बड़ी समस्या है,यह भी हाईवे पर दिखने वाले नीम हकीमो के वॉल-पेनटिंग से पता ही चल जाता है.

दूबे जी के साथ पिछली हाईवे यात्रा बड़ी यादगार रही.वैसे विचारधारा में उनसे मेरा छत्तीस का आकड़ा है,फिर भी यात्रा के बोरिंग लम्हों में चुपचाप बैठे रहने से अच्छा देश की समस्याओं पर दूबे जी का भाषण और नसीहतें सुनना,ज्यादा मनोरंजक है.बातचीत के दौरान एक तेज रफ़्तार ट्रक ने हमें गलत साईड से क्रास किया.अभी हम आगे कुछ मील बढे ही थे कि वो ट्रक हमें सड़क के बीचो बीच धराशाई मिली.दूबे जी सुरक्षित बचे ट्रक ड्राईवर का हालचाल लेने लगे.ड्राईवर पहाड़ो का रहने वाला था और थोडा सांत्वना के बोल सुनते ही अपने दुखों का पिटारा खोल के बैठ गया.पहाड़ी क्षेत्रों में बढती बेरोजगारी और प्रदूषण से दुखी वृद्ध ड्राईवर,अपने बचपन के खूसूरत लम्हों को बयाँ करने लगा.ड्राईवर ने जो बताया,सो बताया पर पहाड़ों का हमारे जीवन में जो महत्व है,उसे कत्तई नज़रंदाज़ नही किया जा सकता.

बचपन में घूमने फिरने या आऊटिंग के लिए पहाड़ों पर जाना मुझे बहुत पसंद था.शादी के बाद संभवतः मेरी तरह का हर युवा हनीमून के लिए भी पहाड़ों पर जाना चाहता है और जीवन के उत्तरार्ध में भी पूजा पाठ और भक्ति के लिए पहाड़ एक अच्छा डेस्टिनेशन है.यानि ज़िन्दगी के हर फेज़ में पहाड़ हमें अपनी ओर बुलाते हैं.यह पहाड़ और वादियाँ सौंदर्य प्रेमी कवियों के लिए प्रेरणा स्रोत हैं.पहाड़ धैर्य,शक्ति,जीवटता,अभिमान,स्थायित्व आदि का भी प्रतीक है.हमारे मुहावरों में भी इन्हें सजाया गया मसलन-खोदा पहाड़ निकली चुहिया,राइ का पहाड़,दुखों का पहाड़,ऊँट पहाड़ के नीचे आदि.हमारी फिल्मों की कलात्मकता को भी चार चाँद लगाया पहाड़ों ने.सोचिये यह पहाड़ न होते,तो वादियों में हीरो हीरोईनों की आवाज कैसे गूंजती.शम्मी कपूर याहू गाने पर बर्फ के बजाए कहाँ उछलते?

हमारे माईथोलोजी में भी पहाड़ों का उल्लेख मिलता है.भोले शंकर का निवास स्थान कैलाश पर्वत पर बताया गया है.समुद्र मंथन में भी मंदराचल पर्वत की भूमिका रही.मुहम्मद साहब को पहला रीवीलेशन 'जबल नूर' पहाड़ के हिरा नाम के गुफा मे मिली.यहूदी और क्रिश्चन मान्यताओं में,ईश्वर के टेन कमांडमेंट्स भी मोज़स को पहाड़ों में ही मिले थे.सवाल यह है कि जीवन के हर पहलू में जब पहाड़ों का इतना इमपारटेंस है तो हम कब इसके महत्व को समझेंगे?वैसे ११ दिसंबर हम 'इंटरनेशनल माउनटेन डे' के तौर पर मना रहे हैं जिसका मुख्य उद्देश्य पहाड़ों का संरक्षण और विकास है पर हम कहीं से भी पहाड़ों को लेकर चिंतित नही दिखते.

बढ़ते प्रदूषण और वनों की कटाई ने पहाड़ों में भूस्खलन को बढ़ा दिया है.बहुत सारे उपयोगी पौधे और हर्ब्स गायब हो रहे हैं.ग्लोबल वार्मिंग ने भी पहाड़ों को पिघलाना शुरू ही कर दिया है.हमारी समस्या यह है कि हम घाव के नासूर बनने के बाद,इलाज ढूंढते हैं.वैसे पर्यावण से जुड़े समस्याओं पर विश्व पहले से ज्यादा चौकन्ना है पर ज़मीनी और बुनियादी स्तर पर भी जागरूकता की जरूरत है.अगर आपने होलीवुड फिल्म २०१२ देखी हो तो फिल्म के अंत में आपने देखा ही होगा कि प्रलय के बाद बनी नयी दुनिया की सबसे ऊंची जगह अफ्रीका के ड्रेकंसबर्ग पर्वत को बताया गया है.सन्देश तो यही है न कि प्रलय के बाद भी इंसान रहे न रहे,यह पर्वत जरूर रहेंगे.सोचना तो हमें अपने बारे में है इसलिए क्यों ना खुद के लिए इन पहाड़ों के बारे में भी थोडा सोचना शुरू कर दें?

११दिसंबर को i-nextमें प्रकाशितhttp://www.inext.co.in/epaper/Default.aspx?edate=12/11/2009&editioncode=1&pageno=16

Friday, November 27, 2009

वो मुड़- मुड़ कर देखना.

दूबे जी आजकल फ्लू से पीड़ित हैं. बदलते मौसम में यह एक सामान्य बात है.पर बात बात पर हम युवाओं और युवा पीढ़ी को कोसने वाले दूबे जी पर चुटकी लेने का मौका कम ही मिलता है सो ऐसा दुर्लभ मौका गवाना मैंने उचित नही समझा.उनसे मिलते ही मैंने पहला बाउनसर डाला.उनके फ्लू को स्वाईन फ्लू की सम्भावना बताकर टेस्ट कराने की हिदायत दे डाली.वो अभी इस वार से सम्हल भी ना पाए थे कि मैंने दूसरा तीर चलाया.मैंने कहा कि उनके जैसा व्यक्ति जो मौसम नही बल्कि बदलते हुए महीने और गुजरते हुए त्योहारों को देखकर कपडे पहनता है(दीवाली के बाद उनके गले में लिपटा मफलर होली के बाद ही उतरता है),वो मौसम के इस हलके फुल्के मिजाज का कैसे शिकार हो गया?

खस्ताहाल दूबे जी,ने इसका भी ठीकरा युवाओं के सर ही फोड़ा.बताने लगे कि आजकल वो लोगों के फैशन बेहेविअर को भी देखकर मौसम का निर्धारण करते हैं.करीब करीब चीखते हुए कहने लगे कि यह आजकल के लड़के लडकियां,इस ठण्ड में भी,इन हलके फुल्के फश्नेबल कपड़ों को ना पहने तो इनका काम ही न चले.कहाँ से कहाँ उन्होंने,उनके इस ट्रेंड को देखकर मौसम का गलत पूर्वानुमान लगाया और बीमार हो गए.बातचीत के दौरान यह भी पता चला कि शहर की कुछ ख़ास लडकियां भी उनके इस हालात् के लिए जिम्मेवार हैं.यह वो हैं जो गर्मी और तेज धूप से बचने के लिए,जून जुलाई में चेहरे को कपड़े दुपट्टे आदि से छिपाकर दुपहियां वाहनों पर चलती हैं.उनकी शिकायत है कि इन सर्दियों में भी वो ऐसा करके धूप गर्मी होने का गलत संकेत क्यों देती हैं?भोले भाले दूबे जी को अब क्या पता कि मौसम की मार से बचने के अलावा यह ट्रेंड बहुत सारी यांगिस्तानियों को मम्मी पापा भाई आदि की नज़रों से बचने,मल्टिपल बॉयफ्रेंड्स मैनैज करने आदि के भी काम आता है.

मेरी बात पूरी तरह से सही नही पर रोजमर्रा की ज़िन्दगी में बहुत ऐसे उदहारण भी मिलते हैं जिन्हें देखकर ऐसा लगता है कि क्या आज के युवा के दो आयाम हैं?एक निजता के पलों में मुहफट,बिंदास,शोख और दूसरा सार्वजनिक तौर पर शिष्टाचार,हया और सादगी से भरा.जी नही.ऐसा नही है.आज का युवा,आडम्बरों में नही जीता,दिल की बातें डायरेक्ट जुबान से बया करता है.पर हमारा सामाजिक परिवेश ही कुछ ऐसा है जो उसे ऐसा करने के लिए मजबूर करता है.चलिए एक एक्साम्पल देता हूँ.बॉयफ्रेंड या गर्लफ्रेंड होना हमारे यहाँ सामाजिक तौर पर स्वीकार्य नही.बहुत ही कम अभिभावक अपने कन्या को अपने सामने उसके बॉयफ्रेंड से बातें करते देखना पसंद करेंगे .पर मैंने ऐसे अनेको उदहारण देखें हैं जहाँ सगाई होने के बाद अनेको पिता,होने वाले दामाद जी का फ़ोन खुद जाकर बेटी को देते हैं और फिर चाहे वो घंटों तक बातें करती रहे,निश्चिंत रहते हैं.हमारे कुछ फ़्रसटेट दोस्त इसे 'लाइसेंस प्राप्त रोमांस' का दर्जा देते हैं.यानी लड़की शादी से पहले किसी को चुने तो अभिवावक परेशान और अगर आप खुद चुनकर दो,तो कोई दिक्कत नहीं.

वस्तुतः सही और गलत को लेकर हमारा फंडा ही ज़रा कनफ्यूज़ड है.'काबिल' बेटा जब आपके सामने शराब पीता है तो यह उसका बोल्ड और पारदर्शी व्यवहार है और अगर आपके पीछे पीता है तो इसे 'लिहाज' का दर्जा दे दिया जाता है.नालायक बेटे तो किसी तरह से भी शराबी ही कहलाते हैं.यानी शराब ख़राब है या नही,यह परिस्थितियों पर निर्भर करता है.वैसे,सिर्फ आलोचना करने से क्या होने वाला है?आज का युवा बहुत हद तक इन समस्याओं को समझने लगा है और इसके अनुसार ढल भी चुका है.वो अपने बड़े बुजुर्गों का आदर भी करता है और अपनी ज़िन्दगी को अपने तरह से जीता भी है.इसका एक उदहारण मुझे रेलवे स्टेशन पर तब देखने को मिला जब जींस टॉप सजी में एक आधुनिक युवती ट्रेन से अपने सास के उतरने पर सर पर अपने स्टाइलिश स्टोल को रखकर पाँव छूकर आर्शीवाद लेती दिखी.यानी युवा तो बदल गया है पर अब समाज के दूसरे हिस्सों को भी बदलने की जरूरत है.शायद तभी वो खाई पटेगी जिसे लोग 'जेनेरेशन गैप' कहते हैं.
२८ नवम्बर को i-next में प्रकाशित.http://www.inext.co.in/epaper/Default.aspx?edate=11/28/2009&editioncode=1&pageno=16